आज तारों की छाओं में बैठे कुछ पुराने दिन याद आ गए…

गाने के दिन, गुनगुनाने के दिन,
किताबों में अर्सों बिताने के दिन,
तारे में रातें जगाने के दिन…

आज दिन तो है , पर तारे नही हैं आस्मान में
… या शायद उन्हें देखने की फुरसत नही है,
किताबें भी हैं , गाने भी हैं,
…मगर गुनगुनाने की फुरसत नही है…

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