Just read some completely awesome poetry by Gulzar here and got inspired. Although I think this poem is very simplistic compared to what he writes, I just couldn’t help but write something based on his style ( I hope) myself!

किसी और सदी की बात ही थी

वो रात का चाँद

वो चाँद की रात

अब तो बस दिन ही दिन ही हैं

ना पहले जैसी कोई बात,

हम चाँद सितारे ढूँढ़ते हैं, हर दिन के ढल जाने के बाद,

हर दिन के आख़िर में फिर से, जुड़वाँ सा दिन मिल जाता है